इस्राईल के दबाव में आकर अमरीका इस प्रास्ताव से निकल चुका है। परमाणु डील में ईरान को अधिकतम 300 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम का भंडार अपने पास रखने की अनुमति थी और इसका संवर्धन ग्रेड 3.67 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए था। मगर आईएईए की रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान का भंडार 2105 किलोग्राम तक पहुंच गया है और यह यूरेनियम 4.5 प्रतिशत के ग्रेड तक संवर्धित है।
परमाणु समझौते की दृष्टि से तो यह भंडार ज़्यादा है लेकिन समझौता होने से पहले ईरान के पास इसका कई गुना अधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार था और दूसरी बात यह है कि परमाणु बम बनाने के लिए 90 प्रतिशत के ग्रेड से अधिक संवर्धन ज़रूरी होता है।
अमरीका के विदेश मंत्री इन दिनों इस्राईल इमारात शांति समझौते पर बहुत इतरा रहे हैं और कह रहे हैं कि फ़ार्स खाड़ी के देशों के अपने दौरे में इसी तरह सूडान की यात्रा में उन्होंने व्यापक रूप से वार्ता की है कि ईरान के ख़तरे से कैसे निपटा जा सकता है।
पोम्पेयो कहते हैं कि इलाक़े में बहुत तेज़ रफ़तार से सुन्नी देशों का गठबंधन बन रहा है जिसका नेतृत्व इस्राईल संभालेगा और सब मिलकर ईरान का मुक़बला करेंगे। उन्होंने यूरोप यात्रा के दौरान पत्रकार सम्मेलन में कहा कि इस्राईल से अरब सरकारों की दोस्ती से पहले अगर फ़िलिस्तीन मुद्दे के समाधान की शर्त रखी जाए तो इससे कोई भलाई हासिल होने वाली नहीं है। तो उनसे यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या सारी भलाई इसमें छिपी है कि अरब सरकारें फ़िलिस्तीन संकट को दिमाग़ से झटक दें और इस्राईल की गोद में जाकर बैठ जाएं?
इस समय अमरीकी प्रशासन बड़ी जल्दी में है और वह चुनावों से पहले ईरान से कोई समझौता कर लेने की कोशिश कर रहा है मगर ईरान बहुत अच्छी तरह ट्रम्प प्रशासन की मंशा को जानता है इसलिए वह कोशिश कर रहा है कि समय बीते और अमरीका में होने वाले चुनावों के नतीजे आ जाएं। इसीलिए ईरान ने अमरीका से वार्ता के संबंध में रूस की मध्यस्थता की पेशकश भी नहीं मानी।
ईरान अपनी शर्त पर डटा हुआ है कि अमरीका से कोई भी वार्ता तब होगी जब वह परमाणु समझौते में वापस लौटे इसीलिए परमाणु समझौते के दायरे से बाहर अमरीका से किसी भी वार्ता से इंकार कर रहा है।
अरब देशों से इस्राईल के शांति समझौते का मक़सद है इन देशों को ईरान के ख़िलाफ़ उकसाना और उनकी धरती का इस्तेमाल करके ईरान के परमाणु, गैस और तेल प्रतिष्ठानों पर हमले करना। इस समझौते के बाद अब इस्राईल को ईरान, इराक़ और यमन के क़रीब क़दम रखने का मौक़ा मिल जाएगा जबकि अरब देशों की वायु सीमा इस्राईल के केवल यात्री विमानों नहीं बल्कि युद्धक विमानों के लिए भी खुल गई हैं।
इसके जवाब में हो सकता है कि ईरान भी तुर्की के साथ मिलकर एक मज़बूत एलायंस बनाए जिसमें इराक़ और बाद में सीरिया भी शामिल हो जाएं। हालिया कुछ दिनों में ईरान के कई संचार माध्यमों ने इस बारे में रिपोर्टें छापी हैं। वैसे भी तुर्की ने क़तर के भीतर सैनिक छावनियां बना रखी हैं जो सऊदी अरब, इमारात और बहरैन के बहुत क़रीब हैं।
ईरान पर अमरीका ने जो प्रतिबंध लगाए उनके परिणाम बहुत सीमित रहे और ईरान में अब तक जनता शासन व्यवस्था के ख़िलाफ़ सड़कों पर नहीं उतरी जबकि इन प्रतिबंधों का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य यही था। यही वजह है कि ट्रम्प प्रशासन विचलित है कि इस योजना के फ़ेल हो जाने के बाद अब उसे क्या करना चाहिए और उसने अरब देशों में ईरान के क़रीब इस्राईल के सैनिक ठिकानों के लिए रास्ता साफ़ करना शुरू कर दिया है कि शायद ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य बल का प्रयोग करने की ज़रूरत पड़ जाए।
मगर यह भी तथ्य है कि अगर इस्राईल ने फ़ार्स खाड़ी के पश्चिमी तट पर अपने सैन्य ठिकाने बनाए तो ईरान का फ़ायदा हो जाएगा क्योंकि यह सब ठिकाने ईरानी मिसाइलों, युद्धक नौकाओं और कमांडोज़ टीमों की पहुंच के भीतर होंगे।
इमारात, बहरैन और बाद में सऊदी अरब में इस्राईली सैनिक छावनियां बन जाने से ईरान के मिसाइलों और ड्रोन विमानों के लिए टारगेट हज़ारों किलोमीटर क़रीब आ जाएगा और उसे सीरिया और लेबनान की छावनियां इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं होगी।
ईरान कई बार कह चुका है कि अगर कोई अमरीकी हमला हुआ तो अरब देशों में अमरीका के सैनिक ठिकानों को निशाना बनाएगा, यही धमकी निश्चित रूप से इस्राईली सैनिक ठिकानों के लिए भी होगी अगर उनका निर्माण इन अरब देशों में किया जाता है। जब जंग छिड़ेगी तो यह सारी छावनियां क़ानूनी टारगेट बन जाएंगी और ईरान के घटक सैनिक संगठन भी ख़ामोश नहीं रहेंगे हमारा इशारा लेबनान के हिज़्बुल्लाह, इराक़ के हश्दुश्शअबी और यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन की ओर है।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार